जुलाई, 2021

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इस अंक में:-
▪️ संपादकीय
▪️ आँखें (कविता)
▪️ जिंदगी बहुत जी ली किताबें साथ में रखकर (ग़ज़ल)
▪️ In the direction of dilemma...
▪️ लब्ज़ों के सहारे जीने की खुशी क्या है (कविता)
▪️ लाख़ ढूढ़ने पर भी ख़ुद को ख़ुद सा नही मिलता (ग़ज़ल)
▪️ A New Remedy!
▪️ बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है (गीत) 
▪️ क्या बतायें हम तुम्हें किसके 'सहारे' साथ हैं (ग़ज़ल)
▪️ इंसानियत
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🗒️ संपादकीय 

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम वर्ष 2020 की शुरुआत हो चुकी थी। सभी अपने-अपने तरीके से नववर्ष का स्वागत कर रहे थे। सेमेस्टर परीक्षा के पश्चात् होने वाली छुट्टियों को बिता छात्र छात्रावास को लौटने लगे लेकिन उन्हें क्या पता था कि सब के हाथ निराशा लगने वाली है। अपने पड़ोसी मुल्क चीन से ये खबर आई कि वहां के वुहान प्रदेश में एक वायरस का प्रकोप बदस्तूर जारी है, जिसे कोविड-19 नाम दिया गया। अचानक 30 जनवरी को भारत में कोविड-19 का पहला केस मिला और देखते ही देखते केस की तादाद में इजाफा होने लगा। इसी बीच मार्च महीने के पूर्वार्ध समाप्त होते ही विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों को छात्रावास खाली कर घर लौटने का निर्देश दिया गया और महीने के समाप्ति के साथ हमारा घर बीएचयू, छात्रावास सूना पड़ गया। देश के प्रधानमंत्री महोदय ने देश में महामारी के रोकथाम के लिए सर्वव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी। लॉकडाउन...लोगों के लिए एक नया शब्द था। सभी अपने-अपने घरों में दुबके रोज समाचाराें पर आंख गड़ाए हुए थे। लोगों में एक अदृश्य वायरस का भय व्याप्त हो चुका था। सभी की ज़िंदगी पूरी तरह थम चुकी थी।

अगस्त-सितंबर महीने में जैसे केस की तादाद में कमी आने लगी वैसे एक लंबे समय से घर बैठे व्याकुल छात्र विश्वविद्यालय परिसर को लौटने लगे। जैसे दो दूर किये हुए आशिक़ एक अरसे बाद मिलते हैं। परिसर खुलवाने के लिए छात्रों ने मोर्चा संभाल लिया था। एक कड़ी मशक्कत के पश्चात् अंतिम वर्ष के छात्र छात्रवास में पुनः लौटे और उनकी कक्षा का संचालन ऑफलाइन तरीके से भी करने का निर्णय विश्वविद्यालय प्रशासन ने लिया। इसी बीच अन्य वर्ष के छात्र भी अपने कक्षा के ऑफलाइन संचालन की मांग करने लगे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि अभी और इंतज़ार करना होगा। अचानक फिर केस की तादाद में वृद्धि होने लगी और देखते-देखते पुनः सभी छात्र मजबूरन अपने घर को लौट रहे थे। देश कोविड-19 के दूसरे लहर की गिरफ्त में आ चुका था। हर तरफ मृत्यु का तांडव हो रहा था। एक बार फिर से वही डर, वही माहौल लेकिन इस बार कुछ हमारे ही हमसे दूर जा चुके थे... किसे पता था कि एक लॉकडाउन अपनों के साथ कि यादें देगा और दूसरा उन्हें हमसे छीन लेगा।

अब जब कोविड- 19 के दूसरे लहर के धीरे-धीरे अवसान के साथ जहां एक ओर देश भर में क्रियाकलापों को पूर्व की भांति सक्रियता प्रदान करने की कोशिश की जा रही है, वहीं दूसरी ओर आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास के द्वितीय वर्ष के कुछ उत्साही अंत:वासी छात्रावास की पत्रिका "आयाम" को सक्रिय करने की पहल कर रहे हैं। आयाम के इस संस्करण में आपको सत्र 2020-21 में आए नए छात्रों को छात्रावास में कमरा ना आवंटन होने के कारण प्रथम वर्ष की सहभागिता की कमी जरूर खल सकती है फिर भी उम्मीद है कि एक नए शुरूआत के इस चरण में प्रकाशित रचनाओं द्वारा आप आनंदित होंगे।
✍🏼 सिद्धार्थ कुमार
(द्वितीय वर्ष)
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🗒️ आँखें (कविता)

गेसू रूपी खंजर का संग
बहुधा देती नीली आँखें,
दर्पण को देख सदा खिलतीं
आँखें काली स्याही आँखें।

चंदर तो बस वसुधा का है
कैसे देखें उसको आँखें,
मन में घबराहट करती हैं
रेशम कीटों सी ये आँखें। 

बातें कानों को चुभती हैं
तब बस करूणा देखें आँखें,
धारण नीरव को करती हैं
वे मझली सझली दो आँखें।

कैलाश नहीं बन सकता वो
स्वयं गरलपान करती आँखें,
झरने फूटे बहतीं संग संग
वे बंद जुबानों की आँखें।

सुधा, पीयूष का मोह नहीं 
निर्दोष नहीं हैं वे आँखें,
बेल पत्रों को पड़ती वे
विष में डूबी शिव की आँखें।

नारद हैं और याचक भी हैं
धरती सी गोल बनीं आँखें,
बिनती है उन देवों से भी
जिनकी छाया उनकी आँखें।

स्याही फैली जब चेहरों पर
तब निर्णय स्वयं बनी आँखें,
पत्थर होता जब भी हृदय
कंपित होतीं चट्टानी आँखें।

लहरें आती और जाती हैं
पर एक जगह स्थिर आँखें,
सागर भी सिंचित कर देती
जब रोदन करती नीरव आँखें।

तिमिर बुलाए सो जाएं
सूरज की पीली-पीली आँखें,
पुष्प देख खिल उठती हैं
उपवन के मधुकर-सी आँखें।

शाश्वत हैं, प्रेम रसिक भी हैं
मदिरा-सी छलकी वे आँखें,
पलकों पर नींद बिठाती हैं
सरिता बहतीं, रक्तिम आँखें। 

भंगुर होता मानव हर क्षण
विप्लव गीत गाती आँखें,
 प्रेम पत्र से डरती हैं वे
संशय में डूबी काली आँखें।

उड़ते पंछी के कलरव को
जाहिर करती अंबर-सी आँखें,
नफरत रूपी हर खत को पढ़तीं 
वे मधुशाला की प्यारी आँखें।।
✍🏼 सिद्धार्थ अजय
(तृतीय वर्ष)
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🗒️जिंदगी बहुत जी ली किताबें साथ में रखकर
      (ग़ज़ल) 

जिंदगी बहुत जी ली किताबें साथ में रखकर 
हजारों रास्ते देखे किताबें साथ में रखकर।

वहीं मिलना हुआ ऐसा मुहब्बत भूल कर सारी 
यारी हमने भी की थी किताबें साथ में रखकर।

निभाना भी समझते थे, गंवाना भी समझते थे 
कभी हंसते थे रातों को किताबें साथ में रखकर। 

गुजरते जो गए लम्हें वो यादें बनके बहते हैं 
मिल बांटकर पढ़ना किताबें साथ में रखकर। 

वो भूले दौर-ए-बचपन जमाने से बढ़े आगे
उड़ाते थे धुआँ पीछे किताबें साथ में रखकर। 

किया पीछा गुलाबों का पर खाली हाथ ही लौटे
जमाना तब महकता था किताबें साथ में रखकर।। 
✍🏼 सिद्धार्थ अजय

सिद्धार्थ अजय
(बी. ए. तृतीय वर्ष, इतिहास)
(कमरा संख्या- 18)


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🗒️In the direction of dilemma...
In the direction of dilemma..... 
Hence there are some issue with me, 
Where the light of lamp make some dark mark, 
The mind of high power goes through the inverse flow. 
Only creation make me as human other things don't. 
Complex brain is not a robust foe, but it's drag down. 
Under the park of beauty the darkness fear me. 
I don't hate all , but as I am Honest!

                                  ✍🏼 Ashish Jha
(third year)
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🗒️ लब्जों के सहारे जीने की खुशी क्या है (कविता)

लब्जों के सहारे जीने की खुशी क्या है ?
कभी पैरों को जमीं पर रख, देखो।

मुमकिन है कि इन काली रात की दीया तुम बनो
यूँ ही जगमगाते रहो, लब्ज खामोश रखो ।।

बात छोटी होती है पर किस्से बड़े 
इसलिए ही सजता है रंगमंच, जीवन का। 

पारदर्शी होते हैं आइने चेहरे के 
झलक उठता है हर चित्र आंखों से।। 

मौन रहना भी क्या रहस्य है 
छिपा रहता है विच्छेदित सारे तार जीवन के।। 

यूं ही नहीं अल्प शब्द आते हैं जुबां पर
बयां कर सकता है चेहरा भी बहुत कुछ।। 
✍🏼Ashish Jha

Ashish Jha
(B.A. Third Year, Statistics)

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🗒️ लाख ढूंढने पर भी ख़ुद को ख़ुद सा नहीं मिलता (ग़ज़ल)

लाख़ ढूढ़ने पर भी ख़ुद को ख़ुद सा नही मिलता।
आदमी तो मिलता है कम्बख़्त दिल नही मिलता।

सब कुछ मिलता है आदमी को सिवाय इसके।
चैन ओ सुकूँ के चक्कर मे चैन ओ सुकूँ नही मिलता।

वो खुश क़िस्मत हैं "बान" जो तेरे साये में पले हैं।
हर किसी को दफ़न के लिए "अमरोहा" नही मिलता।

मुझसे मिलने वाला आता है उस वक़्त मिलने मुझसे।
उसे पता होता है कि उस वक़्त मैं घर नही मिलता।

जिनके सोना जागना उठना बैठना साथ था कभी।
उन यारो से आज कल हाथ तक नही मिलता।

ये बात मुझे कहनी तो नही थी पर कह देता हूँ।
अब शफ़ाखाने जाने वालों का सुराग़ नही मिलता।
✍🏼 देवेश

देवेश कुमार
(बी. ए. तृतीय वर्ष)

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🗒️A New Remedy!

"It was the Best of Times,

It was the Worst of Times."

What is bad in new world? World is getting globalized and digitalized, but so is all evil traits of human. The internet has probably been man’s greatest invention since 'bubble wrap' but a few words uttered on it can have a violent repercussion in other hemisphere owing to altering context. Digital harassment, fake news menace together with labelling and character assassination, all these are the consequences of Economic models which capitalise on short attention of humans, reducing human beings to a swipe or Ad profile. They all are tilting society towards increased polarisation and populism.

We’ve developed a culture that not only judges, but determines the entire worth of a human, all too often, by their worst moment. Nullifying entire credentials of a human being over few words is wrong. In times, when even a single visual or keyword can elevate emotion and inflict social or mental harm, it’s our duty to go beyond the obvious keywords, take a pause, and connect it with other things. While struggling with limited attention spam, generation isn’t reading between the lines and understanding wider implication of issues leading to a populist and polar world.

Other trending thing to carry out digitally is to change context of statement to deceit general public. Generation Z (Anyone born 1997 onward) and their technology is also working as an amplifier for Conspiracy theories and misinformation. As a result, vaccine hesitancy and climate misinformation are on rise, costing lives. Algorithms are limiting our views by promoting silos of Humans digitally. Information overload is resulting in difficulty in understanding an issue and effectively making decisions. To put it in Robin Williams words "why do they call it rush hour when nothing moves?"

However, our good qualities are frequently ignored by older, nostalgic reviewers, who instead focus on our weaknesses. Time used to flow slowly in the past. Around 350 years after invention of telescope, humans immersed in true space age. On the contrary, 20 years since development of WWW, its widespread adoption and smooth integration into our daily lives, wonders us. Another example of fast advances can be quoted from the field of brain science. It has been only 15 years since the invention of the MRI, ‘Thinking Machine’ and Thinking through machine is now possible. Moore's law states computing power doubled every 2 years. Best example for exponential rise in computation could be that gadget on which you are reading this article has more computational power than all of NASA when it landed two Homo sapiens on the Moon in 1969.

The Middle-aged uncle's rebuke of "today's generation" and their nostalgic contrast, it doesn't hold ground. A plethora of advancement have been observed in all domains.accompanied by IT revolution which had affected everyday life and which has gone the furthest globally. Millennial are multitasking and filling inequalities cultivated across generations. Instead of criticising one should understand how they fit into the fabric of the ever-changing economy.

Life isn’t binary, world isn’t good enough and surely isn’t bad. Still there are ways to improve it. Follow the topic in depth, and be aware of altering perspective. You don’t need fixed dose of dopamine per swipe. Instead, millennial curiosity when combined with focusing and connecting things might be a game changer.

What should one do to inculcate a broad perspective and a finer understanding, as well as avoid making quick judgments? Quizzing, debating, reading newspapers, and other old world classics come to mind. For instance, quizzing needs enhanced awareness, wide and in depth analysis. You need to leave all possibility/perspectives open. A man who was bestowed with medal by British raj for his support in Boer war can turn into symbol of Raj Decline and man who brought it down, can be our dear Bapu, MK Gandhi. You will have to tackle similar questions which need breadth, deduction and lateral thinking. Behind the spontaneity and liveliness of quizzing world lies in hard work, researching and logical processing of thoughts. It has many of the desired characteristics. It’s our new remedy, Quizzing.
✍🏼 Rajnikant Lal

Rajnikant Lal
(He is 2nd year Economics Student, active member and resident of AND hostel.
He is also core member Of Prometheans Quiz Club.)


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🗒️ बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है (गीत)

बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है 

आँगन के तुलसी की जैसी पावन तन-मन वाली हो 
महका दे जो मुझको ऐसी बारिश  सावन  वाली  हो
आँखों की तपस मिटाने को बस आनन एक तुम्हारा है
सिखला  दे  जो  प्रेम  सभी को, ऐसा  प्रेम  हमारा है
जब से तुमको आँखें देखीं, आँखों का श्रृंगार हुआ है 
बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है 

अम्मा जैसे बरस बितातीं उपवास को साधे - साधे 
पापा  जैसे  माला फेरें सुबह - सवेरे राधे - राधे 
हमने भी वैसे तुमको मन - मंदिर में सजा लिया है 
दिल के कोने -कोने में बस नाम तुम्हारा बसा लिया है 
तुमको जीवन में लाने का, मेरा यह विचार हुआ है 
बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है 

दादी के है पास जो कंगन, उसकी तो हकदार तुम्हीं हो 
कभी हँसाये कभी रुलाये जो है चेहरा यार तुम्हीं हो 
छत पर रखे गमले का वह पौधा तुमको बुला रहा है
यादों से जो बना है झूला, रोज मुझे वो झुला रहा है 
सपने मेरे थे जो भी, अब उन पर भी अधिकार हुआ है 
बात ज़ुबाँ पर कैसे लाएँ, हमको तुमसे प्यार हुआ है
✍🏼 शुभम देव त्रिपाठी
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🗒️ क्या बतायें हम तुम्हें किसके 'सहारे' साथ हैं (ग़ज़ल)

क्या बतायें हम तुम्हें किसके 'सहारे' साथ हैं 
झूठ बोला है किसी ने सब  हमारे  साथ  हैं 

खो गयी रंगत यहाँ से और खुशबू गुम हुई 
सब परिंदे उड़ गए, बस पेड़ सारे साथ हैं 

ये जो पानी है नदी का, बह रहा है लीक पर 
ये बहेगा लीक पर, जब तक किनारे साथ हैं 

आसमाँ में दिखने वाले सब - के - सब पाबंद हैं 
किसने तुमसे कह दिया , ये चाँद तारे  साथ  हैं 

आँख खोला तो ये जाना, कौन कैसा है यहाँ 
सब मुनाफ़िक़ खूबसूरत भेष  धारे  साथ  हैं

हम तुम्हें अपना बना लें, आग थी दिल में कभी 
आग कबकी  बुझ  गयी  पर  वो शरारे साथ हैं

हम किसी को भूल जाएं, होगा ये हरगिज़ नहीं 
बाग अपने  कट  गए , दिलकश नज़ारे साथ हैं 

इतने पैसों को बचा कर क्या करेंगे आप सर 
बाँट दीजिए इनमें जो दामन पसारे  साथ  हैं 

तुम जुदा तो हो गए पर क्या कहें उनसे 'शुभम'
जो  अभी  भी  सोचते  हैं  हम  तुम्हारे साथ हैं
✍🏼 शुभम देव त्रिपाठी

शुभम देव त्रिपाठी
(बी. ए. द्वितीय वर्ष, इतिहास)

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🗒️ इंसानियत

"क्या यह आधुनिकता की तरफ आज के इंसान की ताबड़तोड़ दौड़ उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती हैं?" यही सवाल काफी दिनों से मन में घर करे हुए था। आज कोरोना जैसी महामारी और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की वजह से होने वाले मौतों से मन जाने-अनजाने में व्यथित और चिंतित दोनों ही हो जाता है। सुबह भी बार-बार यह ख्याल आता जाता रहा, एक-दो लोगों से मिला भी तो इसी पर बातचीत हुआ लेकिन क्या बिना आधुनिकता के अब ये जीवन संभव है? यही कुछ सवाल लिए मैं अपने बिस्तर पर आ गया, लाइट्स तो सारी बंद कर चुका हूं। पहले मैं अपने रूम का पंखा चलता छोड़ देता था बस ऐसे ही कि रूम ठंडा बना रहे पर अब मैं बंद कर देता हूँ, इससे लगता है मैं थोड़ा समझदार हो गया हूं। अंधेरे कमरे में विचारों को पढ़ पाना कितना आसान होता है न ऐसा मैंने देखा है खुद के साथ। कुछ देर से खांसी बार-बार आ रही है। कभी-कभी आ जाती है, कोरोना से पहले आती तो शायद नहीं सोचता उतना पर अब दिमाग में बहुत सारी शंकाएं जन्म लेने लगती हैं, ऑक्सिमीटर तो अब जैसे मेरा हमसफर है। दिन में 1-2 बार चेक कर लेता हूँ अपना ऑक्सीजन वगैरह। वैसे ये फ़ोन, लाइट, ऑक्सिमीटर, पंखा इत्यादि सभी ही तो आधुनिकता की देन हैं न। ये एक तरह से इंसान के अस्तित्व के लिए जरूरी भी हैं। मैं कन्फ्यूज्ड हो जाता हूँ जब कोई जवाब नहीं मिलता की यह सही है कि यह। 

एक मित्र बता रहा था, कुछ समय पहले तक बहुत तरह के यज्ञ, हवन होते देखे और धार्मिक अनुष्ठान होते देखे हैं, पर वो भी इस आधुनिकता की भीड़ में ऑनलाइन हो गए हैं या फिर गायब ही हो गए हैं। मैंने भी गौर किया तो यह सच जैसा ही लगा, यज्ञ इत्यादि धार्मिक होते थे परंतु हमको अपनी जड़ों से जोड़े रहते थे, आजकल सभी लोग विभिन्न प्रकार के मनोरंजन में व्यस्त हैं पर रामायण, महाभारत जैसे काव्य पढ़ने का फुरसत नहीं। प्रकृति जननी है हमारी, आपकी और उन हजारों अलग-अलग तरह की प्रजातियों की जो यहां रह रही हैं। हमको इतनी ताकत के साथ कभी अस्तित्व में नहीं लाया गया था कि हम अपने जननी का ही हनन करते हुए इतने कष्ट देते गए कि उसका सब्र टूट जाये और वो हमको सजा देने लगे अपने कर्मों की, जैसे मां को ज्यादा परेशान करने या छोटे भाई से लड़ने पर डांट पड़ती हैं तो सजा मिलती हैं। यही लगता है अब तो मुझे जैसे प्रकृति कोई संतुलन बना रही हो! काफी लोगों का कहना है कि ये वायरस इंसान का बनाया हुआ है, इस बात पर न जाते हुए की क्यों बनाया, उद्देश्य क्या था, इस पर गौर करना चाहिए कि क्या इंसान ने एक जीव (कोरोना वायरस) की सरंचना और उसके अस्तित्व को खतरा पैदा नहीं किया? जो आज इतना विकराल रूप ले चुका है और तबाही का मंजर आपके सामने है। आवश्यकता ही आविष्कार को जन्म देती हैं, आविष्कार हो रहे हैं और होते ही जा रहे हैं लेकिन क्या ये कभी थमेंगे इसका कोई थ्रेशहोल्ड है? इंसानी सोच, उसका लालच और उसके सपने स्पेस की तरह अनंत है। जिसे न ही कोई नाप सकता हैं ना ही कोई पूरा कर सकता है, ऐसे ही आगे बढ़ने की होड़ में हमारी जिंदगी तो आसान हो जाएगी परन्तु जीना मुश्किल। 

कुछ दिन पहले की बात है मेरे कमरे के सामने एक कबूतर का घोंसला था उसका एक बच्चा गिर गया और वो मर गया मुझे बच्चे पर बहुत दया आयी और मैंने उसे वही एक गड्ढा खोद के उसमें दफना दिया महादेव के नाम के साथ, मुझे अच्छा नहीं लग रहा था की दूसरे जीव उसके मांस को छीन ले जा रहे हैं और उसकी मां ऊपर घोंसले से देख देख के तड़प रही है। साथ ही किसी के मृत शरीर को कचरे में या ऐसे ही फेंक देना उचित नहीं। लेकिन एक सवाल मेरे मन में आया कि हम लोग किसी भी जीव के बच्चे को देखते हैं तो दया भाव जाग जाता हैं। लेकिन अगर हम मुर्गा, बकरा या अन्य जीव को खाते हैं तब क्यों नहीं? वो भी तो एक जान हैं, मैं भी खाता था पहले पर अब मैं बंद कर चुका हूँ, हां कुछ जीवों का खून मेरे हाथों में भी है जो मुझे अब पछतावा कराता है।

ये जानवर या इंसान शब्द ही नहीं होना चाहिए था, ताकतवर और कमजोर की तुलना करवा देता है। अगर सभी जीव होते सिर्फ तो कितना आसान रहता। काश हम लोग अब भी समझ पाएं और बस करे वरना पेड़-पौधे, पक्षी की जगह रोबोट्स ले लेंगे, कोयल की कूह और मोर का नाचना सब एक सपना होगा। जंगल और झरनों का मजा सिर्फ टीवी स्क्रीन पर होगा।
मन नहीं कर रहा लिखने का फिर से थोड़ा परेशान हूं, आंखें दुखने लगी हैं ये फ़ोन की लाइट का असर है ये भी तो आधुनिकता की देन हैं। अब सो जाना चाहिए क्योंकि कल फिर से सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट की थ्योरी को अपनाना है और जीना है। पर मैं अब ठान चुका हूं किसी जीव को हानि नहीं पहुँचाऊँगा, कम से कम यह सोच कर तो बिलकुल नहीं कि मैं ताकतवर हूं तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ। मेरे इस प्रयास से कुछ दिन या कुछ घंटे की मोहलत मिल जाये हम इंसानो को यहां जीने के लिए,आप भी करना यह प्रयास अच्छा लगेगा......

ध्यान रखना ताकतवर सिर्फ प्रकृति है उनके अलावा कोई नहीं,अगर हम ताकतवर होते तो इतनी जानें न गयी होती।
✍🏼 विमलेंदु चौहान

विमलेंदु चौहान


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© सर्वाधिकार सुरक्षित "आयाम"

आयाम संचालक दल:-
 सिद्धार्थ कुमार, हरि प्रिय & समीर यादव
               (सभी द्वितीय वर्ष)
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Comments

  1. खूबसूरत ।
    बस आयाम के इस खूबसूरत सफर को इसी तरह आगे बढ़ाए रखिये ।
    मुझे याद है आयाम के कई अंको को भित्ति पत्रिका के रूप में भी प्रकाशित किया गया था, पर जिस प्रकार से समय को देखते हुए इसके डिजिटल संस्करणों को लाया गया वो काबिले तारीफ है।
    सभी अनुजों से यही अपेक्षा है कि वो इस सफर को यूँही बनाये रखेगे और इस पत्रिका को अपनी रचनात्मकता को निखारने, व प्रदर्शित करने के लिए बढ़ चढ़ कर आगे आएंगे ।

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  2. Good luck brother
    Keep it up

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  3. ए एन डी के भूतपूर्व छात्र होने के नाते पत्रिका देख के खुशी हुई किन्तु पत्रिका के विषय वस्तु का स्तर देख शीघ्र ही सारी खुशी काफूर हो गई । ऐसा प्रतीत होता है कि संपादक महोदय को व्याकरण से गहरी खुन्नस है। आशीष झा dialema क्या होता है भाई? Dilemma होता है भाई जिसका मतलब होता है दुविधा! खैर जब टाइटल में ही ब्लंडर हो तो कविता किस स्तर की होगी , सहज अंदाजा लगाया जा सकता । बेहद घटिया कविता है झा साहब । देवेश की ग़ज़ल ठीक ठाक थी। बाकी सब केवल बकवास है है और कुछ नहीं। सुधार लाओ ।

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  4. सबसे ज्यादा प्रशंसा करूँगा आप सब के प्रयास की। ये अच्छी बात है कि हॉस्टल की एक परंपरा अब भी जिंदा है और सुरक्षित हाथों में है। यही खूबी है जो इस हॉस्टल को बाकी हॉस्टलों से अलग बनाता है।
    सभी लेखक साथियों ने भी अच्छा प्रयास किया है, सभी को बधाई। बस हर दिन सुधार और अपने विषयवस्तु को और अच्छा बनाने में लगे रहिए। सभी लोग खूब पढ़िए जिससे लेखनी भी शार्प होगी। कविताएं तो हर एक इंसान के मन की आवाज होती हैं उन्हें अच्छे या बुरे में बाँट नहीं सकते। हाँ लेखों में आप सब ध्यान रखें कि जितने कम क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से अपनी बात कह सकें उतना कम रखें। बिलकुल कैज़ुअल भी नहीं होना है लेकिन सामान्य भाषा का भी प्रयोग करने का प्रयास करें। बाकी एक बार फिर पूरी टीम को बधाई।
    बस अब आयाम का लोगो बदल दो यार 6 साल से यही चल रहा है

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  5. आयाम की पूरी टीम को बधाई, कठिन काल में पहल हेतू. सम्पादकीय में उकेरी गयी टीस सामुहिक वेदना है, बाकी कविताएं, गज़ल भी बेहतर है, विमलेंदु जी का लेख इंसानियत कई प्रश्नो को छूता है, अच्छा है कि वो हिंसा से प्राप्त मांसाहार को त्याज्य दिए, ऐसे प्रसंग प्रेरित करते हैं, उनको बहुत बहुत बधाई. सिद्धार्थ, आशीष की कविताएं, गज़ल बेहतर है, आप लोग क्रमशः और पढ़िए, लिखिये, ज़मीं के इन्सां से मिलते रहिये, निखार आना ही है. पुनः सभी को बहुत बहुत बधाई, शुभकामनाएं. सादर.

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    Replies
    1. Room no-86, Bhavisya Gandhi aur Buddha ke bataye gaye marg me h, n ki hinsa ke raste me .
      ALVIDA AND
      17 JUNE 2016 , 2:00PM ,Batch 2013to 2016,NSS .
      kuch yad aaya bhaiya!🙏🙏

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    2. जी, उस समय काल में मानसिक यात्रा कराने के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं. शुक्रिया आपका हालांकि आप का नाम इस पटल पर प्रदर्शित नहीं है, अतः आपको पहचान पाने में असमर्थ पा रहा हूँ. आपको पुनः बहुत बहुत धन्यवाद, शुभकामनाएं बेहतर भविष्य के लिए. नीरज.

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    3. Bhaiya mai is samay room no -86 me rahata hu aur aapke bataye gaye raste par chal raha hu.
      Name-Ravi Karan
      Mob no- 6389062107
      🙏Kabhi BHU Aana ho to room jarur aaiyega bhaiya .🙏

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    4. रवि कर्ण जी, प्रत्युत्तर में परिचय पाकर अतीव खुशी हुई. आपका नंबर मैंने सेव कर दिया है, मेरा नंबर है 9956555666. जब भी विश्विद्यालय आना होगा छात्रावास आकर जरूर आपसे मिलूंगा. तब तक अपना ख्याल रखिए, अपनी रवि किरणों से सबको उजाले से सराबोर करिए, यही मंगलकामना. बहुत बहुत धन्यवाद प्रिय भाई. सादर प्रणाम.
      .

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  6. सच कहा, "सब कुछ मिलता है आदमी को सिवाय इसके।
    चैन ओ सुकूँ के चक्कर मे चैन ओ सुकूँ नही मिलता।"
    सबने कितना सुंदर लिखा है, हर एक गज़ल, कविता, लेख। बहुत बढ़िया।

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