वज्रपात


मैं मृत्यु का बन के चारण अब सबको सत्य बताऊँगा

मैं रौद्र रूप कर के धारण अब समर कराने आऊँगा

अश्रुकण को मैं भांप बना अब घोर घात करने आया

वरदान कहीं अभिशाप बना मैं वज्रपात करने आया

क्यों मेरी कविता मौन रहे शब्दों से युद्ध करूँगा अब

क्यों रौद्र भावना गौण रहे अश्कों को क्रुद्ध करूँगा अब

मैं सूरज प्राची को दिलवा रश्मि से बात करूँगा अब

गाण्डीव सव्यसाची को दिलवा तिमिर के साथ लड़ूँगा अब

वो लहू बहाते सीमा पर कुछ घर में बैठे हंसते हैं

वीरों को मौत नहीं आती वो अमरत्व में बसते हैं

एक बेटा माँ का मरता है है आँचल सुना हो जाता

पछताता भाग्य पर हूँ अपने उस माँ का बेटा हो पाता!

कर्मठ यौवन सीमा पर है रक्तिम सावन सीमा पर है

एक राम दिखाई पड़ता है सहस्त्र रावण सीमा पर हैं

सीने पर उसके है भारी शत स्वप्नों का बाजार लगा

अरमानों की भीड़ लगी वो करने सब साकार चला

उनके कर्तव्यों पर लेकिन  आवाज उठाते हैं कायर

बन जाओ वीरता के चारण क्यों बनते प्रेम भरे शायर?

वो चलता सागर चीर सदा दिखता छोटा हिमराज वहाँ

काँधे पर रख कर वीर सदा अस्त्र से करता आगाज़ वहाँ

संसद की चौखट पर मैंने लांछन उस पर लगते देखा

कुर्सी की खातिर नेता ने है देशप्रेम बिकते देखा

क्या खून नहीं खौलेगा अब? क्या भूखंड नहीं डोलेगा अब?

मैं चुप होकर क्या जी लूँगा? क्या कवि नहीं बोलेगा अब?

साँसों को रोकना कठिन नहीं शब्दों को कैसे रोकोगे?

तुम कुकूर बनो, मैं एकलव्य भर शर मुह में क्या भौंकोगे?

चेताता हूँ मैं, चुप रहना वीरों को अपशब्द कहना

वरना स्याही का छोड़ प्रयोग मैं अस्त्र उठा कर आऊंगा,

मैं वज्रपात कर जाऊंगा।।



---ऋत्विकरुद्र


ऋत्विक रुद्र बीए (ऑनर्स) प्रथम वर्ष के छात्र हैं । उन्होंने इस कविता के लिए अभिरंग 2019 में हिंदी कविता प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। प्रतियोगिता का एक विषय प्रेम था और उन्होंने मातृभूमि के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करते हुए यह कविता लिखी थी।

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