AAYAM AUGUST EDITION
AAYAM
Blog page of A.N.D. HOSTEL,FSS,B.H.U.
AUGUST 2019
इस अंक में...
संपादकीय- नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष )
आमुख कथा
• चाची की चाय - कृष्ण नंदन (द्वितीय वर्ष)
नौबहार
• कविता - हिमांंशु राज (तृतीय वर्ष)
समसामयिक
• सत्तातंत्र का समीकरण - प्रवीण कुमार (द्वितीय वर्ष)
उर्दू: प्रेम का अदब
• बदनाम शायर - सागर कुमार( तृतीय वर्ष)
हॉस्टल रिपोर्ट
• हाल-ए-ए.एन.डी. - नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष)
बुक शेल्फ
• चूड़़ी बाजार मेें लड़़की
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संपादकीय
1 अप्रैल 2016 को आयाम का पहला अंक प्रकाशित हुआ था जो कि छात्रावास की भित्ति पत्रिका हुआ करती थी। आयाम का पूर्व नाम पहल हुआ करता था। विगत तीन वर्षों से लगातार चल रही इस पत्रिका को पिछले सत्र में ऑनलाइन ब्लॉग पेज के रूप में रूपांतरित कर दिया गया है। वैश्विक युग में अपने विचारों को अधिकतम जनमानस तक पहुँचाने के लिए ऑनलाइन एक सशक्त व अनिवार्य माध्यम बन चुका है। छात्रावास की यह पत्रिका अन्तःवासियों के सृजनात्मक क्षमता को उचित मंच देने को सदैव तत्पर रहा है और आगे भी रहेगा। ऑनलाइन माध्यम में हो जाने से अब हम छात्रावास की सृजनात्मक विचार से अधिकतम लोगों को अवगत करा पाएंगे।
देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में हुए प्रवेश परीक्षाओं में छात्रावास के होनहार छात्रों ने परचम लहराया। आयाम संपादकीय मंडल उन सबको बधाई देता है व राष्ट्र निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी की अग्रिम शुभकामनाएं देता है।
अस्सी छात्रों का नया उत्साही बैच छात्रावास की रौनक बढ़ाने आ चुका है। सीखने सिखाने की प्रक्रिया की शुरुआत परिचय व संवाद कार्यक्रम से हो चुकी है। प्रत्येक नव-आगंतुक छात्र छात्रावास व विश्विद्यालय के माहौल से प्रफ्फुलित हैं।
संपादकीय मंडल ने यह निश्चित किया है कि प्रत्येक महीने ब्लॉग पेज पर विभिन्न स्तम्भों के माध्यम से लेख को जगह मिलेगा। प्रत्येक अंतःवासी समसामयिक, नौबहार, उर्दू:प्रेम का अदब, बुकशेल्फ, शख्शियत वाले स्तम्भ में अपनी रचनायें भेज सकते हैं। हम अगले संस्करण के लिए यात्रा-विवरण,अलुमुनि के पत्र, हास्य-व्यंग तीन स्तम्भ में भी रचना प्राप्त करने की आशा रखते हैं।
नए सत्र में हम आशा करते हैं कि आपका और हमारा रचनाओं व विचारों का संबंध और प्रगाढ़ होगा। आप निरंतर अपनी रचनाओं को भेजकर रिश्ते में गर्माहट बनाये रखें। सभी पाठकगण को स्वतंत्रता दिवस व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं।
नीतीश कुमार
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आमुख कथा
चाची की चाय..
आप एएनडी, एसएमडी,राजाराम,सरदार पटेल या फिर भाभा हॉस्टल में रहने वाले हैं आपको सुबह सुबह चाय पीने का बहुत मन है। हॉस्टल की कैंटीन में चाय नहीं पीना चाहते हैं। आइए मैं आपको प्यार भरी चाय पिलाता हूं। इसके लिए आपको बस करौंदी गेट तक चलना होगा। अरे अरे चिंता मत कीजिए गेट के बाहर नहीं जाना पड़ेगा। वो आगे जो पोस्ट ऑफिस और केंद्रीय विद्यालय दिख रहा है न उसी के बगल में है चाय की एक छोटी सी दुकान। जिसे चला रही हैं एक बूढ़ी चाची। चाची के चेहरे की झुर्रियों के अनुभवों की मिठास से लबरेज होकर बनती है चाची की चाय। इस चाय में शक्कर से ज्यादा प्यार की मिठास होती है जिसे पीकर आपको एक अलग स्फूर्ति महसूस होती है। तो अब देख का रहे हैं महाराज बस अपने सामने रखी चाय की प्याली उठाइए और बड़े प्रेम से उसे अपने होठों से लगाइये और चाची की चाय का मजा लीजिए। आपको यही पर समोसे भी मिल जाएंगे बा 3 रुपए का एक समोसा। इसके अलावा भी आपको चाय के साथ खाने के लिए वो नमकीन वाला कुरकुरा बिस्कुट भी मिल जाएगा।
अरे देखिए आपको चाय पिलाते पिलाते आपको चाची और उनकी दुकान का परिचय देना भूल ही गया। हालांकि हमें यह परिचय प्राप्त करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। तीन दिन और अपनी आदत के विपरीत आठ कप चाय एवं थोड़ी बहुत प्यार भरी डांट के बाद मिला था चाची का परिचय।
चाची का नाम है प्रभावती देवी। इनके नाम की तरह ही इनकी चाय का भी बड़ा प्रभाव है। और वो चाची के पीछे बैठे समोसों को बनाते और तलते जो दिखाई दे रहे हैं उ हैं चाची के भांजे घनश्याम जी। चाची का घर भी ज्यादा दूर नहीं बस सुंदरपुर में ही है। और हाँ एक बात बताना तो भूल ही जा रहा हूँ चाची के जो लड़के हैं न उ भी अपनी ही यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं नाम है दीपक।
चाची का इतना परिचय काफी है अब थोड़ा उनकी दुकान के बारे में भी जान लीजिए। चाची की दुकान और अपने विश्वविद्यालय का बहुते गहरा नाता है। इ दुकान और अपना विश्वविद्यालय दुनो एके साथ बने रहे। पहिले ए दुकान के चाची के सास ससुर चलाए और उके बाद इनके पति चलाए। उनके गुजरने के बाद पिछले करीब 25 सालों से चाची इ दुकान को चला रही है। हमको लगता है कि अब आप थोड़े बोर हो रहे हैं। आइए एक एक कप चाय और लेते हैं फिर कहानी आगे बढ़ाते हैं।
हां, तो मैं कहां था... हां याद आ गया। शुरू शुरू में ई दुकान उ गेट के बाहर थी लेकिन करीब पिछले 30 सालों से ये गेट के अंदर ही है और लोगों को प्यार से भरी चाय पिला रही है। दुकान एकदम सबेरे सबेरे 5 बजे खुल जाती है। आपको चाय 6 बजे तक आराम से मिल जाएगी। दुकान दिन में करीब तीन बजे तक दुकान खुली रहती है उसके बाद बंद हो जाती है। उ का ह न कि चाची भी इतनी देर काम करने के बाद थक जाती हैं।
रोज करीब 200 से 300 चाय और समोसे के शौकीन लोग चाची की दुकान पर आते हैं और एकदम कड़क चाय का आनंद उठाते हैं। साथ ही साथ घर से इतनी दूर आए लड़कों/लड़कियों को भी मां के हाथ का सा स्वाद और प्यार मिल जाता है। अगर आपके पास पैसे नहीं हैं और आपको चाय पीनी है तो बस चाची से आप एकबार बता दीजिए। चाची कहती हैं कि " कौनो बात ना बा बचवा बादी में दे दीहा।" चाची बताती हैं कि कई बार तो लोग चाय पीकर जाएंगे और फिर पैसे देने कभी नहीं आयेंगे। ऐसी ही एक घटना के बारे में उन्होंने बताया भी कि " एक बार कौनो आदमी रहे चरपहिया से आइल रहल। उ पचास समोसा लिहल और तबले बगलिया में जौन केंद्रीय विद्यालय बा न ओकर छुट्टी हो गइल। भीड़ क फ़ायदा उठा के उ चरपहियवा वाला बिना पैसा देहले भाग गइल।"
इसके बाद भी चाची लोगों को उधार दे देती हैं। जहां सभी दुकानों पर सामान लेने के साथ ही पैसे देने होते हैं वहीं चाची की दुकान पर आप आराम से चाय पीने के बाद पैसे दे सकते हैं। इसके बारे में पूछने पर चाची कहती हैं कि,"बच्चा इ उनकर ईमान धरम ह की उ हमरे साथ बेईमानी करिही की ईमानदारी हमके त बस आपन करम करे के बा।"
और बताइए आपको कैसी लगी चाची की चाय...
कृष्ण नंदन
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नौबहार
नौबहार में इसबार आपलोगों के समक्ष तृतीय वर्ष के हिमांशु राज की दो कविता प्रस्तुत है। हिमांशु कमरा संख्या 48 में रहते हैं। आप सामाजिक विज्ञान संकाय के पोएट्री क्लब 'तर्ज़-ए-सुख़न' के संस्थापक सदस्य हैं।
कविता 1
अगर तुम्हारी आँखों में है बादल,
और तुम्हारे शरीर मे रेत है,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम/
अगर विसरती है तुम्हारे शरीर से
मेहनत के पसीने की बदबू,
अगर फैक्ट्री के धुएं से पड़ गया
है तुम्हारा चेहरा काला,
हाथो की नसें अगर मोती हो उभर
आयी है पेड़ की जड़ो के मानिंद,
तुम्हारे चेहरे पर अब तक है,
चेचक के दाग
यकीन मानो, छोटे नहीं हो तुम/
अगर जाते हो तुम रेल के टॉयलेट
में ठूंस ठूंस कर,
अगर तुम भी बीच कर सो जाते हो अपना गमछा,
अगर अब भी है तुम्हारी आंखों
में मुठ्ठी भर आसमान,
अगर अब तक नही गला
तुम्हारे हौसले का बर्फ,
अगर अब भी अपनी दिहाड़ी
से देखते हो अपने बच्चों को
'कलेक्टर साब' बनाने का सपना,
अगर अब भी तुम बनाते हो पंजाब में सेठो की कोठियां,
अगर अब भी चू रही है तुम्हारी
मड़ई की छान,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम।
अगर तुम्हें पता है,
सपने जीये जाते है,
राते काटी जाती है,
दिन गुजर जाता है,
बारिश बेमौसम भी आती है,
बाढ़ के बाद फिर से गांव बसते है,
रेत से जाँबाज़ पैदा होते है,
पेड़ किसी की राह तकते सुख जाते है,
माँ अपने हिस्से की मिठाई बच्चों के लिए बचा देती है,
उनींदी आँखे आधी ही खुलती है,
पूरे सपने लिए,
तो यकीन मानो कोई तुम्हे छोटा नही कर सकता।
कविता 2
साहब का हुक्म आया है,
दरबार बुलाया जाएगा,
तय होगा दोष,
एक किसान और मरा है,
हजारो के मरने के बाद,
अगले महीने चुनाव है,
ये भी है रखना याद।
एक साहब का सिद्धांत है,आत्महत्या नही,
है ये देव हत्या।
खेत पानी की कमी से नही फ़टे है,
बूढ़े ब्रह्म के गाल पर पड़ गयी है झुर्रियां।
जल मंत्री का दावा है,
इंद्र हुए है रुष्ट,
किसानों ने जरूर कृष्ण को पूजा होगा।
किसान भूख से नही सूखे है,
सब सूर्य देव का है दोष,
किसानों के खून से सूर्य हुए है लाल।
गर्मी आखिर यूँही थोड़े बढ़ी है।
इतनी आहुतियों से नही चलेगा काम,
वर्षा को चाहिए और हजारो जानें,
आखिर देवेंद्र है, राहु ,केतु या शनि थोड़े ही है,
कर्ज यूँही नही बढ़ा,
किसानों ने हल बढ़ा दिए है,
गहरा जोत रहे है खेत,
लक्ष्मी के वक्ष में लग गया है घाव।
मिट्टी की उपज घट गई है,
क्योंकि किसान जमीन में नही होते दफन,
टांग देते है खुद को शाखाओं से,
मिट्टी की उपज का तरीका जो जानना हो,
पूछो संसद के इन आकाओं से।
साहब गहरी चिंता में है,
आत्महत्या कैसे रोकी जाय,
मंत्री ने सुझाया है,
पेड़ सारे कटवा दिए जाय।
यूरिया , डी ए पी नही बाटें जाय,
ताकि जहर न ये खाएं,
एक नई योजना बनाई जाए,
किसानों की जमीन फिर छीनी जाय,
जमीन से निकाले कोई हाइवे,
नाम किसान सड़क रखी जाय,
एक नया मुद्दा जल्द उछाला जाय,
ताकि ये मामला जल्द दब पाएं।
चलो कर लो पूरी तैयारी,
किसानों को फुसलाया जाय।
किसानों की भी सभा लगी है,
नही बहलाये फुसलाये जाएंगे,
चावल ,धान, दूध, प्याज सब,
रास्तो पर फैलाये जाएंगे,
चाय , कॉफी , कैपचीनो,
मिनरल वाटर में बनाये जाएंगे।
छोड़ो दो तुम बजट बनाना
किसान न्यू इण्डिया बनाएंगे।
साहब का हुक्म आया है...
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समसामयिक
सत्तातंत्र का समीकरण
राज्य के नागरिक सामान्यतः किसी विशेष राजनीतिक दल की विचारधारा से प्रभावित होकर उस दल के प्रतिनिधि को अपना समर्थन देते हैं, हालांकि उस दल के प्रतिनिधि की सिर्फ एक ही विचारधारा होती है "आइडियोलॉजी ऑफ सेल्फ इंटरेस्ट"। उनका ध्येय किसी भी प्रकार मूल्यों को ताक पर रखकर अपने हितों की पूर्ति कर सत्ता पर काबिज रहना होता है। आज की राजनीति का यही चरित्र है, इसलिए लोकतंत्र के पीछे सत्तातंत्र का कुरूप चेहरा पर्दे के पीछे अपना रंगमंच सजाये बैठा रहता है और यहीं "प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र" संदेह के घेरे में आ जाता है।
मसलन हाल ही की राजनीतिक उठापटक कर्नाटक में ही देखिए जब कांग्रेस-जेडीएस सरकार के 16 विधायक पार्टी से इस्तीफा देते हैं, उसके बाद मुख्य विपक्षी दल के एक नेता विद्रोही MLAs को चार्टेड प्लेन से मुम्बई के एक होटल में ले जाते हैं ताकि उनसे सरकार की कोई नई डील ना हो जाए जिसे आज "resort politics" कहते हैं। उधर सदन में कांग्रेस- जेडीएस सरकार अपना बहुमत खो देती है, सरकार बहुमत सिद्ध नहीं कर पाती है तो राज्यपाल सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं, बी.एस येदुरप्पा नए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं। इस तरह कर्नाटक के राजनीतिक नाटक की समाप्ति होती है।
राजनीतिक दलों के पास ऐसी कोई विचारधारा नहीं है कि जिससे वो अपने सदस्यों को उन सिद्धांतों से बांधे रखे। राजनीति व्यक्तिगत लोभ और लालच की पूर्ति का जरिया बन चुकी है, जनता से किसी को कोई सरोकार नहीं है। जनता किसी भी दल को अपना समर्थन दे लेकिन दलों के अपने राजनीतिक समीकरण होते हैं, सत्ता पर कौन काबिज होगा यह राजनीतिज्ञ ही तय करेंगें।
फिर भी लोकतंत्र आम जनता की आशाओं पर टिका है, जनता यही चाहती है की इस तरह निजी स्वार्थो के लिए राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर न बनाया जाए, इससे लोकतंत्र कमजोर होता है। दलबदल-विरोधी कानून को और अधिक मजबूत किया जाए।
यह लेख द्वितीय वर्ष के प्रवीण के द्वारा लिखा गया है। प्रवीण को किताबें पढ़ने का शौक है।
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उर्दू: प्रेम का अदब
बदनाम शायर
साहिर लुधियानवी
जन्म:- 8 मार्च 1921
वफ़ात:- 25 oct. 1980
साहिर, जिसका अर्थ ही होता है 'जादूगर', वाक़ई अब्दुल हई के नाम से पैदा हुआ वो कलम का जादूगर, जिसके नग्मों की झंकार आज का प्रेमी जोड़ा भी बिना गुनगुनाए नहीं रह सकता, हमें ग़ज़लों, गीतों, नज़्मों का ऐसा मीरास छोड़ गया जो आने वाली कई नस्लों को मुत्तासिर करता रहेगा। बात करें साहिर की ज़ाती ज़िन्दगी की तो मुल्क़ के बंटवारे के बाद वो माँ के साथ पंजाब आकर बस गए। उनके वालिद जो एक एक अय्याश व्यक्ति थे, ने उन दोनों को अकेला छोड़ दिया। माँ की देखरेख में उनकी परवरिश लुधियाना में हुई। कॉलेज के दिनों से ही वे अपने शेरों के लिए मशहूर हो गए। बाद में चलकर अमृता प्रीतम से प्यार का परवान चढ़ा, जो कमोबेश असफल रहा। हालांकि ये प्यार इमरोज़ के आ जाने से त्रिकोणीय बन गया। साहिर की ज़िंदगी में एक बार फिर जवाँ दिल ने दस्तक दी। इस दफ़ा वो बॉलीवुड की गायिका सुधा मल्होत्रा थीं। इससे बार भी साहिर असफल रहे, लेकिन सुधा के निक़ाह के रोज़ जो नग़मा गाया वो बड़ा मशहूर हुआ-
"चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों"...
इसके बाद साहिर तरक्क़ी पसन्द आफ़्ता शायरों की सूची में आए। साहिर ने बॉलीवुड में सैकड़ों फिल्मों के गीत लिखे। चुनिंदा कुछ फ़िल्म थे- 'बाज़ी', 'प्यासा', 'कभी-कभी' इत्यादि। उनकी एक तवील नज़्म 'परछाइयां' आज भी प्रासंगिक हैं। साहिर वे पहले नग़मा-निगार थे जिनके प्रयासों से आकाशवाणी में प्रसारित हो रहे गीतों में गीतकारों का भी उल्लेख किया जाता है। फिल्मी गीतों के लिए उन्हें 'फिल्मफेयर' अवार्ड से नवाज़ा गया।
उनकी कुछ चुनिंदा पंक्तियों में शामिल है-
: "वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा'
: "मैं फूल टांक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में, तुम्हारी आंख मसर्रत से झुकती जाती है'
: "मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत में कभी कभी'
: 'तेरा मिलना खुशी की बात सही, तुझसे मिलकर उदास रहता हूँ'...
सागर तृतीय वर्ष के छात्र हैं। गजल,कविता लिखने में इनकी रुचि है। इनका मानना है कि उर्दू भाषा भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने का बेहतरीन माध्यम बन सकता है। इनसे कमरा संख्या 29 में मिला जा सकता है।
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हॉस्टल रिपोर्ट
हाल - ए - ए. एन. डी.
सेमेस्टर की लंबी छुट्टी बिताने के बाद अन्तःवासियों को सबसे बड़ा तोहफा मिला कमरे में नए रंग पोतन के रूप में। रंग पोतन से सभी छात्र इतने प्रफुल्लित थे लेकिन नंदू भैया असमंजस में पड़ गए कि इस बार उनकी वॉलपेपर की बिक्री इतनी कम कैसे हो गयी। हमेशा छात्रावास में संघर्ष मेस को हटाने के लिए होता है लेकिन इस बार संघर्ष महाराज को चाभी दिलाने के लिए हुआ। अन्तःवासियों की संघर्ष की इस गाथा में इसबार घर के मुखिया विलेन बनने ही वाले थे लेकिन संकाय के मुखिया ने छात्रों के मन मुताबिक फैसला सुनाया।
प्रत्येक वर्ष की भाँति नए प्रफुल्लित चेहरे का फिर से छात्रावास में प्रवेश हुआ है। अस्सी छात्रों का नया बैच जोश व उल्लास से भरपूर है। नवागंतुक क्लासेस के पीछे अपनी आधी एनर्जी निकाल रहे हैं और बची खुची अनिल महाराज के भोजन पर। शुरुआत में तो अनिल महाराज का भोजन कोई थ्री स्टार होटल से कम थोड़े ही है।
नए छात्रों का परिचय व संवाद कार्यक्रम आयोजित किया जा चुका है। नवागंतुक छात्र अब धीरे धीरे होस्टल की परंपरा से वाकिफ होते जा रहे हैं। द्वितीय वर्ष के छात्रों के चेहरे पर सीनियर्स बन जाने की खुशी साफ झलक रही है क्योंकि अब उन्हें भी कोई भैया कहने वाला मिल गया है।
दो वर्ष मस्ती करने वाले तृतीय वर्ष के कर्णधार जो सीनियर और सुपर सीनियर्स दोनों ख्याति साथ लेकर चल रहे हैं वो अब संत बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सुबह से शाम तक लाइब्रेरी उनका घर बन चुका है और पुस्तक उनकी प्रेमिका और उसके शब्द प्रेमिका के गेसुओं की तरह दिन भर छाव दे रहा है।
छात्रावास के छत के ऊपर नए चमकते दमकते सोलर पैनल लगा है लेकिन सभी सोच रहे हैं कि इससे बिजली कब मिलेगी....
उत्साह,जिम्मेदारी,विदाई तीनों के साथ छात्रावास खड़ा है..मन्द मन्द मुस्कुरा रहा है..अशोका के छोटे-छोटे पेड़ों के पत्ते हवा में फरफरा रहें हैं...आवाज कान तक पहुंच कर सोए छात्रों को उनके सपने का आभास दिलाते रहती है।
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बुक शेल्फ
चूड़ी बाजार में लड़की कृष्ण कुमार द्वारा लिखित स्त्री विमर्श पर एक बेहतरीन पुस्तक है। इस पुस्तक को तृतीय वर्ष के नीतीश कुमार ने पढ़ा है। इस पुस्तक की कुछ अच्छी पंक्तियों को आप लोगों के साथ साझा किया जा रहा है। इस पुस्तक में लेखक स्त्रियों की समाज में पिछड़ेपन के सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कारणों की गहन विवेचना करते हैं।
1. स्त्री की आदर्श छवि एक मनुष्य के उन्हीं वैचारिक और नैतिक आग्रहों के तहत बनती है जो लिंगभेद से ऊपर हैं. लड़के का ऐसी लड़की की संकल्पना करता है जो उसे मनुष्य के रूप में प्रेरित करती हो और फिर भी उससे भिन्न हो. लिंग की भिन्नता स्त्री पुरुष के अदम्य आकर्षण का आधार है और इसी पर उनकी पारस्परिकता का विचार टिका है.
2. किशोरमन का एक महत्वपूर्ण पहलू बड़ो की जगह समवयस्कों की राय को सर्वोपरि मानना होता है.
3. लौकिक जगत में एक सामान्य पुरुष के लिए बेहतर विकल्प स्त्री कक पहले से काबू में रखना ठहरता है जिसके तहत उसकी स्वतंत्र शक्ति और शारीरिक व बौद्धिक क्षमताओं का सिलसिलेवार उच्छेदन किया जाता है.
4. सामाजिक सोच और निगाह के बने-बनाये ढाँचे हमें लड़कियों के बाल्यकाल को स्त्री के स्वीकृत जीवन-चक्र में रखकर ही देखने देते हैं,अलग से नहीं.
5. भाग्य और देह खेल में सबसे कठिन बाज़ी खाल के रंग की है. मिथकों पर गौर करें या लोककथाओं पर या फिर आधुनिक साहित्य और पत्रकारिता,सिनेमा और टेलीविजन पर,लड़की के रंग को लेकर हमारी सभ्यता और संस्कृति में डरावनी सहमति दिखाई देती है.
6. भारतीय जीवन में स्त्री की नियति सिर्फ एक वैधानिक मसला नहीं है बल्कि ये एक सांस्कृतिक मसला है.
7. एक लड़की को कपड़े उतार लिए जाने का भय सदा बना रहना चाहिए,यह द्रोपदी के चीर-हरण के मिथक का सहज और कठोर संदेश है.कैसी भी ताकत अथवा संबंध या हैसियत इस भय को दूर रखने के लिए पर्याप्त नहीं है.
8. लड़कों के जमावड़े में लड़कियों से अलगाव को भाषा और व्यवहारिक रूपाकार देने आनी संस्कृति जन्म लेती है और बहुत तेज़ी से ऐसी आदतें या लते पैदा कर देती है जो लड़कियों पर सामूहिक विजय की डींग हांकने, विजय के शाब्दिक दृश्य रचने और उन दृश्यों को सूत्र रूप में व्यक्त करने वाली गालियाँ देने में सुख-संतोष महसूस कराती हैं.
9. लड़कियां हमारी सिर्फ एक या दो अपेक्षाएं को पूरा करके संतोष नहीं दे सकती. उनसे हमारी अपेक्षाएं एक के बाद एक खुलती जाती हैं.
10. अनुभव कभी स्वंय ज्ञान नहीं बन सकता है,क्योंकि ज्ञान का अर्थ है अनुभव की तल्खी से मुक्ति. दूसरी तरफ, गहरे जाकर हिला देने वाले अनुभव को यदि विचार के क्षणों से गुजरने का मौका मिलता है तो इसके बाद हमारे मानस में जन्म लेने वाला ज्ञान कुछ अलग ही आभा और स्फूर्ति लिये होता है. इस तरह उपजने वाले ज्ञान से उस ज्ञान की तुलना नहीं की जा सकती जो सिर्फ पढ़ने या दूसरों को हुए अनुभवों का विश्लेषण करने से मिलता है. वह भी ज्ञान होता है और वह मूल्यवान हो सकता है, मगर अपने अनुभव के ताप को विचार की हवा में ठंडा करके पक्का ज्ञान सोने सरीखा होता है.
11. युवा होने का अभिप्राय किसी समस्या को देखकर तत्काल उसे दूर करने का उपाय खोजने के लिए व्यग्र होना और किसी-न-किसी उपाय पर अमल शुरू कर देना है.
12. संवेदना बहुत समय तक जागृत नहीं रहती, अतएव यदि कोई कदम तुरंत न उठाया जाए तो जीवन की सामान्य गति संवेदना को घेरकर सुला देती है.
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टीम आयाम
मुख्य संपादक : नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष)
सह संपादक : विमलेंदु चौहान (द्वितीय वर्ष)
सह संपादक : कृष्ण नंदन (द्वितीय वर्ष)
टीम आयाम से जुड़ने के लिए अगस्त महीने के ब्लॉग पेज का आलोचनात्मक समीक्षा करके aayam.and.fss@gmail.com पर 30/08/2019 तक भेजें। संपादकीय टीम में केवल आचार्य नरेन्द देव छात्रावास के वर्तमान अंतःवासी ही सहभागिता कर सकते हैं।
आपके सुझाव व प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
©सर्वाधिकार सुरक्षित आयाम
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Blog page of A.N.D. HOSTEL,FSS,B.H.U.
AUGUST 2019
इस अंक में...
संपादकीय- नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष )
आमुख कथा
• चाची की चाय - कृष्ण नंदन (द्वितीय वर्ष)
नौबहार
• कविता - हिमांंशु राज (तृतीय वर्ष)
समसामयिक
• सत्तातंत्र का समीकरण - प्रवीण कुमार (द्वितीय वर्ष)
उर्दू: प्रेम का अदब
• बदनाम शायर - सागर कुमार( तृतीय वर्ष)
हॉस्टल रिपोर्ट
• हाल-ए-ए.एन.डी. - नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष)
बुक शेल्फ
• चूड़़ी बाजार मेें लड़़की
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संपादकीय
1 अप्रैल 2016 को आयाम का पहला अंक प्रकाशित हुआ था जो कि छात्रावास की भित्ति पत्रिका हुआ करती थी। आयाम का पूर्व नाम पहल हुआ करता था। विगत तीन वर्षों से लगातार चल रही इस पत्रिका को पिछले सत्र में ऑनलाइन ब्लॉग पेज के रूप में रूपांतरित कर दिया गया है। वैश्विक युग में अपने विचारों को अधिकतम जनमानस तक पहुँचाने के लिए ऑनलाइन एक सशक्त व अनिवार्य माध्यम बन चुका है। छात्रावास की यह पत्रिका अन्तःवासियों के सृजनात्मक क्षमता को उचित मंच देने को सदैव तत्पर रहा है और आगे भी रहेगा। ऑनलाइन माध्यम में हो जाने से अब हम छात्रावास की सृजनात्मक विचार से अधिकतम लोगों को अवगत करा पाएंगे।
देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों में हुए प्रवेश परीक्षाओं में छात्रावास के होनहार छात्रों ने परचम लहराया। आयाम संपादकीय मंडल उन सबको बधाई देता है व राष्ट्र निर्माण में उनकी सक्रिय भागीदारी की अग्रिम शुभकामनाएं देता है।
अस्सी छात्रों का नया उत्साही बैच छात्रावास की रौनक बढ़ाने आ चुका है। सीखने सिखाने की प्रक्रिया की शुरुआत परिचय व संवाद कार्यक्रम से हो चुकी है। प्रत्येक नव-आगंतुक छात्र छात्रावास व विश्विद्यालय के माहौल से प्रफ्फुलित हैं।
संपादकीय मंडल ने यह निश्चित किया है कि प्रत्येक महीने ब्लॉग पेज पर विभिन्न स्तम्भों के माध्यम से लेख को जगह मिलेगा। प्रत्येक अंतःवासी समसामयिक, नौबहार, उर्दू:प्रेम का अदब, बुकशेल्फ, शख्शियत वाले स्तम्भ में अपनी रचनायें भेज सकते हैं। हम अगले संस्करण के लिए यात्रा-विवरण,अलुमुनि के पत्र, हास्य-व्यंग तीन स्तम्भ में भी रचना प्राप्त करने की आशा रखते हैं।
नए सत्र में हम आशा करते हैं कि आपका और हमारा रचनाओं व विचारों का संबंध और प्रगाढ़ होगा। आप निरंतर अपनी रचनाओं को भेजकर रिश्ते में गर्माहट बनाये रखें। सभी पाठकगण को स्वतंत्रता दिवस व श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं।
नीतीश कुमार
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आमुख कथा
चाची की चाय..
आप एएनडी, एसएमडी,राजाराम,सरदार पटेल या फिर भाभा हॉस्टल में रहने वाले हैं आपको सुबह सुबह चाय पीने का बहुत मन है। हॉस्टल की कैंटीन में चाय नहीं पीना चाहते हैं। आइए मैं आपको प्यार भरी चाय पिलाता हूं। इसके लिए आपको बस करौंदी गेट तक चलना होगा। अरे अरे चिंता मत कीजिए गेट के बाहर नहीं जाना पड़ेगा। वो आगे जो पोस्ट ऑफिस और केंद्रीय विद्यालय दिख रहा है न उसी के बगल में है चाय की एक छोटी सी दुकान। जिसे चला रही हैं एक बूढ़ी चाची। चाची के चेहरे की झुर्रियों के अनुभवों की मिठास से लबरेज होकर बनती है चाची की चाय। इस चाय में शक्कर से ज्यादा प्यार की मिठास होती है जिसे पीकर आपको एक अलग स्फूर्ति महसूस होती है। तो अब देख का रहे हैं महाराज बस अपने सामने रखी चाय की प्याली उठाइए और बड़े प्रेम से उसे अपने होठों से लगाइये और चाची की चाय का मजा लीजिए। आपको यही पर समोसे भी मिल जाएंगे बा 3 रुपए का एक समोसा। इसके अलावा भी आपको चाय के साथ खाने के लिए वो नमकीन वाला कुरकुरा बिस्कुट भी मिल जाएगा।
अरे देखिए आपको चाय पिलाते पिलाते आपको चाची और उनकी दुकान का परिचय देना भूल ही गया। हालांकि हमें यह परिचय प्राप्त करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। तीन दिन और अपनी आदत के विपरीत आठ कप चाय एवं थोड़ी बहुत प्यार भरी डांट के बाद मिला था चाची का परिचय।
चाची का नाम है प्रभावती देवी। इनके नाम की तरह ही इनकी चाय का भी बड़ा प्रभाव है। और वो चाची के पीछे बैठे समोसों को बनाते और तलते जो दिखाई दे रहे हैं उ हैं चाची के भांजे घनश्याम जी। चाची का घर भी ज्यादा दूर नहीं बस सुंदरपुर में ही है। और हाँ एक बात बताना तो भूल ही जा रहा हूँ चाची के जो लड़के हैं न उ भी अपनी ही यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं नाम है दीपक।
चाची का इतना परिचय काफी है अब थोड़ा उनकी दुकान के बारे में भी जान लीजिए। चाची की दुकान और अपने विश्वविद्यालय का बहुते गहरा नाता है। इ दुकान और अपना विश्वविद्यालय दुनो एके साथ बने रहे। पहिले ए दुकान के चाची के सास ससुर चलाए और उके बाद इनके पति चलाए। उनके गुजरने के बाद पिछले करीब 25 सालों से चाची इ दुकान को चला रही है। हमको लगता है कि अब आप थोड़े बोर हो रहे हैं। आइए एक एक कप चाय और लेते हैं फिर कहानी आगे बढ़ाते हैं।
हां, तो मैं कहां था... हां याद आ गया। शुरू शुरू में ई दुकान उ गेट के बाहर थी लेकिन करीब पिछले 30 सालों से ये गेट के अंदर ही है और लोगों को प्यार से भरी चाय पिला रही है। दुकान एकदम सबेरे सबेरे 5 बजे खुल जाती है। आपको चाय 6 बजे तक आराम से मिल जाएगी। दुकान दिन में करीब तीन बजे तक दुकान खुली रहती है उसके बाद बंद हो जाती है। उ का ह न कि चाची भी इतनी देर काम करने के बाद थक जाती हैं।
रोज करीब 200 से 300 चाय और समोसे के शौकीन लोग चाची की दुकान पर आते हैं और एकदम कड़क चाय का आनंद उठाते हैं। साथ ही साथ घर से इतनी दूर आए लड़कों/लड़कियों को भी मां के हाथ का सा स्वाद और प्यार मिल जाता है। अगर आपके पास पैसे नहीं हैं और आपको चाय पीनी है तो बस चाची से आप एकबार बता दीजिए। चाची कहती हैं कि " कौनो बात ना बा बचवा बादी में दे दीहा।" चाची बताती हैं कि कई बार तो लोग चाय पीकर जाएंगे और फिर पैसे देने कभी नहीं आयेंगे। ऐसी ही एक घटना के बारे में उन्होंने बताया भी कि " एक बार कौनो आदमी रहे चरपहिया से आइल रहल। उ पचास समोसा लिहल और तबले बगलिया में जौन केंद्रीय विद्यालय बा न ओकर छुट्टी हो गइल। भीड़ क फ़ायदा उठा के उ चरपहियवा वाला बिना पैसा देहले भाग गइल।"
इसके बाद भी चाची लोगों को उधार दे देती हैं। जहां सभी दुकानों पर सामान लेने के साथ ही पैसे देने होते हैं वहीं चाची की दुकान पर आप आराम से चाय पीने के बाद पैसे दे सकते हैं। इसके बारे में पूछने पर चाची कहती हैं कि,"बच्चा इ उनकर ईमान धरम ह की उ हमरे साथ बेईमानी करिही की ईमानदारी हमके त बस आपन करम करे के बा।"
और बताइए आपको कैसी लगी चाची की चाय...
कृष्ण नंदन
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नौबहार
नौबहार में इसबार आपलोगों के समक्ष तृतीय वर्ष के हिमांशु राज की दो कविता प्रस्तुत है। हिमांशु कमरा संख्या 48 में रहते हैं। आप सामाजिक विज्ञान संकाय के पोएट्री क्लब 'तर्ज़-ए-सुख़न' के संस्थापक सदस्य हैं।
कविता 1
अगर तुम्हारी आँखों में है बादल,
और तुम्हारे शरीर मे रेत है,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम/
अगर विसरती है तुम्हारे शरीर से
मेहनत के पसीने की बदबू,
अगर फैक्ट्री के धुएं से पड़ गया
है तुम्हारा चेहरा काला,
हाथो की नसें अगर मोती हो उभर
आयी है पेड़ की जड़ो के मानिंद,
तुम्हारे चेहरे पर अब तक है,
चेचक के दाग
यकीन मानो, छोटे नहीं हो तुम/
अगर जाते हो तुम रेल के टॉयलेट
में ठूंस ठूंस कर,
अगर तुम भी बीच कर सो जाते हो अपना गमछा,
अगर अब भी है तुम्हारी आंखों
में मुठ्ठी भर आसमान,
अगर अब तक नही गला
तुम्हारे हौसले का बर्फ,
अगर अब भी अपनी दिहाड़ी
से देखते हो अपने बच्चों को
'कलेक्टर साब' बनाने का सपना,
अगर अब भी तुम बनाते हो पंजाब में सेठो की कोठियां,
अगर अब भी चू रही है तुम्हारी
मड़ई की छान,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम।
अगर तुम्हें पता है,
सपने जीये जाते है,
राते काटी जाती है,
दिन गुजर जाता है,
बारिश बेमौसम भी आती है,
बाढ़ के बाद फिर से गांव बसते है,
रेत से जाँबाज़ पैदा होते है,
पेड़ किसी की राह तकते सुख जाते है,
माँ अपने हिस्से की मिठाई बच्चों के लिए बचा देती है,
उनींदी आँखे आधी ही खुलती है,
पूरे सपने लिए,
तो यकीन मानो कोई तुम्हे छोटा नही कर सकता।
कविता 2
साहब का हुक्म आया है,
दरबार बुलाया जाएगा,
तय होगा दोष,
एक किसान और मरा है,
हजारो के मरने के बाद,
अगले महीने चुनाव है,
ये भी है रखना याद।
एक साहब का सिद्धांत है,आत्महत्या नही,
है ये देव हत्या।
खेत पानी की कमी से नही फ़टे है,
बूढ़े ब्रह्म के गाल पर पड़ गयी है झुर्रियां।
जल मंत्री का दावा है,
इंद्र हुए है रुष्ट,
किसानों ने जरूर कृष्ण को पूजा होगा।
किसान भूख से नही सूखे है,
सब सूर्य देव का है दोष,
किसानों के खून से सूर्य हुए है लाल।
गर्मी आखिर यूँही थोड़े बढ़ी है।
इतनी आहुतियों से नही चलेगा काम,
वर्षा को चाहिए और हजारो जानें,
आखिर देवेंद्र है, राहु ,केतु या शनि थोड़े ही है,
कर्ज यूँही नही बढ़ा,
किसानों ने हल बढ़ा दिए है,
गहरा जोत रहे है खेत,
लक्ष्मी के वक्ष में लग गया है घाव।
मिट्टी की उपज घट गई है,
क्योंकि किसान जमीन में नही होते दफन,
टांग देते है खुद को शाखाओं से,
मिट्टी की उपज का तरीका जो जानना हो,
पूछो संसद के इन आकाओं से।
साहब गहरी चिंता में है,
आत्महत्या कैसे रोकी जाय,
मंत्री ने सुझाया है,
पेड़ सारे कटवा दिए जाय।
यूरिया , डी ए पी नही बाटें जाय,
ताकि जहर न ये खाएं,
एक नई योजना बनाई जाए,
किसानों की जमीन फिर छीनी जाय,
जमीन से निकाले कोई हाइवे,
नाम किसान सड़क रखी जाय,
एक नया मुद्दा जल्द उछाला जाय,
ताकि ये मामला जल्द दब पाएं।
चलो कर लो पूरी तैयारी,
किसानों को फुसलाया जाय।
किसानों की भी सभा लगी है,
नही बहलाये फुसलाये जाएंगे,
चावल ,धान, दूध, प्याज सब,
रास्तो पर फैलाये जाएंगे,
चाय , कॉफी , कैपचीनो,
मिनरल वाटर में बनाये जाएंगे।
छोड़ो दो तुम बजट बनाना
किसान न्यू इण्डिया बनाएंगे।
साहब का हुक्म आया है...
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समसामयिक
सत्तातंत्र का समीकरण
राज्य के नागरिक सामान्यतः किसी विशेष राजनीतिक दल की विचारधारा से प्रभावित होकर उस दल के प्रतिनिधि को अपना समर्थन देते हैं, हालांकि उस दल के प्रतिनिधि की सिर्फ एक ही विचारधारा होती है "आइडियोलॉजी ऑफ सेल्फ इंटरेस्ट"। उनका ध्येय किसी भी प्रकार मूल्यों को ताक पर रखकर अपने हितों की पूर्ति कर सत्ता पर काबिज रहना होता है। आज की राजनीति का यही चरित्र है, इसलिए लोकतंत्र के पीछे सत्तातंत्र का कुरूप चेहरा पर्दे के पीछे अपना रंगमंच सजाये बैठा रहता है और यहीं "प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र" संदेह के घेरे में आ जाता है।
मसलन हाल ही की राजनीतिक उठापटक कर्नाटक में ही देखिए जब कांग्रेस-जेडीएस सरकार के 16 विधायक पार्टी से इस्तीफा देते हैं, उसके बाद मुख्य विपक्षी दल के एक नेता विद्रोही MLAs को चार्टेड प्लेन से मुम्बई के एक होटल में ले जाते हैं ताकि उनसे सरकार की कोई नई डील ना हो जाए जिसे आज "resort politics" कहते हैं। उधर सदन में कांग्रेस- जेडीएस सरकार अपना बहुमत खो देती है, सरकार बहुमत सिद्ध नहीं कर पाती है तो राज्यपाल सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं, बी.एस येदुरप्पा नए मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हैं। इस तरह कर्नाटक के राजनीतिक नाटक की समाप्ति होती है।
राजनीतिक दलों के पास ऐसी कोई विचारधारा नहीं है कि जिससे वो अपने सदस्यों को उन सिद्धांतों से बांधे रखे। राजनीति व्यक्तिगत लोभ और लालच की पूर्ति का जरिया बन चुकी है, जनता से किसी को कोई सरोकार नहीं है। जनता किसी भी दल को अपना समर्थन दे लेकिन दलों के अपने राजनीतिक समीकरण होते हैं, सत्ता पर कौन काबिज होगा यह राजनीतिज्ञ ही तय करेंगें।
फिर भी लोकतंत्र आम जनता की आशाओं पर टिका है, जनता यही चाहती है की इस तरह निजी स्वार्थो के लिए राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर न बनाया जाए, इससे लोकतंत्र कमजोर होता है। दलबदल-विरोधी कानून को और अधिक मजबूत किया जाए।
यह लेख द्वितीय वर्ष के प्रवीण के द्वारा लिखा गया है। प्रवीण को किताबें पढ़ने का शौक है।
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उर्दू: प्रेम का अदब
बदनाम शायर
साहिर लुधियानवी
जन्म:- 8 मार्च 1921
वफ़ात:- 25 oct. 1980
साहिर, जिसका अर्थ ही होता है 'जादूगर', वाक़ई अब्दुल हई के नाम से पैदा हुआ वो कलम का जादूगर, जिसके नग्मों की झंकार आज का प्रेमी जोड़ा भी बिना गुनगुनाए नहीं रह सकता, हमें ग़ज़लों, गीतों, नज़्मों का ऐसा मीरास छोड़ गया जो आने वाली कई नस्लों को मुत्तासिर करता रहेगा। बात करें साहिर की ज़ाती ज़िन्दगी की तो मुल्क़ के बंटवारे के बाद वो माँ के साथ पंजाब आकर बस गए। उनके वालिद जो एक एक अय्याश व्यक्ति थे, ने उन दोनों को अकेला छोड़ दिया। माँ की देखरेख में उनकी परवरिश लुधियाना में हुई। कॉलेज के दिनों से ही वे अपने शेरों के लिए मशहूर हो गए। बाद में चलकर अमृता प्रीतम से प्यार का परवान चढ़ा, जो कमोबेश असफल रहा। हालांकि ये प्यार इमरोज़ के आ जाने से त्रिकोणीय बन गया। साहिर की ज़िंदगी में एक बार फिर जवाँ दिल ने दस्तक दी। इस दफ़ा वो बॉलीवुड की गायिका सुधा मल्होत्रा थीं। इससे बार भी साहिर असफल रहे, लेकिन सुधा के निक़ाह के रोज़ जो नग़मा गाया वो बड़ा मशहूर हुआ-
"चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों"...
इसके बाद साहिर तरक्क़ी पसन्द आफ़्ता शायरों की सूची में आए। साहिर ने बॉलीवुड में सैकड़ों फिल्मों के गीत लिखे। चुनिंदा कुछ फ़िल्म थे- 'बाज़ी', 'प्यासा', 'कभी-कभी' इत्यादि। उनकी एक तवील नज़्म 'परछाइयां' आज भी प्रासंगिक हैं। साहिर वे पहले नग़मा-निगार थे जिनके प्रयासों से आकाशवाणी में प्रसारित हो रहे गीतों में गीतकारों का भी उल्लेख किया जाता है। फिल्मी गीतों के लिए उन्हें 'फिल्मफेयर' अवार्ड से नवाज़ा गया।
उनकी कुछ चुनिंदा पंक्तियों में शामिल है-
: "वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा'
: "मैं फूल टांक रहा हूँ तुम्हारे जूड़े में, तुम्हारी आंख मसर्रत से झुकती जाती है'
: "मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत में कभी कभी'
: 'तेरा मिलना खुशी की बात सही, तुझसे मिलकर उदास रहता हूँ'...
सागर तृतीय वर्ष के छात्र हैं। गजल,कविता लिखने में इनकी रुचि है। इनका मानना है कि उर्दू भाषा भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने का बेहतरीन माध्यम बन सकता है। इनसे कमरा संख्या 29 में मिला जा सकता है।
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हॉस्टल रिपोर्ट
हाल - ए - ए. एन. डी.
सेमेस्टर की लंबी छुट्टी बिताने के बाद अन्तःवासियों को सबसे बड़ा तोहफा मिला कमरे में नए रंग पोतन के रूप में। रंग पोतन से सभी छात्र इतने प्रफुल्लित थे लेकिन नंदू भैया असमंजस में पड़ गए कि इस बार उनकी वॉलपेपर की बिक्री इतनी कम कैसे हो गयी। हमेशा छात्रावास में संघर्ष मेस को हटाने के लिए होता है लेकिन इस बार संघर्ष महाराज को चाभी दिलाने के लिए हुआ। अन्तःवासियों की संघर्ष की इस गाथा में इसबार घर के मुखिया विलेन बनने ही वाले थे लेकिन संकाय के मुखिया ने छात्रों के मन मुताबिक फैसला सुनाया।
प्रत्येक वर्ष की भाँति नए प्रफुल्लित चेहरे का फिर से छात्रावास में प्रवेश हुआ है। अस्सी छात्रों का नया बैच जोश व उल्लास से भरपूर है। नवागंतुक क्लासेस के पीछे अपनी आधी एनर्जी निकाल रहे हैं और बची खुची अनिल महाराज के भोजन पर। शुरुआत में तो अनिल महाराज का भोजन कोई थ्री स्टार होटल से कम थोड़े ही है।
नए छात्रों का परिचय व संवाद कार्यक्रम आयोजित किया जा चुका है। नवागंतुक छात्र अब धीरे धीरे होस्टल की परंपरा से वाकिफ होते जा रहे हैं। द्वितीय वर्ष के छात्रों के चेहरे पर सीनियर्स बन जाने की खुशी साफ झलक रही है क्योंकि अब उन्हें भी कोई भैया कहने वाला मिल गया है।
दो वर्ष मस्ती करने वाले तृतीय वर्ष के कर्णधार जो सीनियर और सुपर सीनियर्स दोनों ख्याति साथ लेकर चल रहे हैं वो अब संत बनने की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सुबह से शाम तक लाइब्रेरी उनका घर बन चुका है और पुस्तक उनकी प्रेमिका और उसके शब्द प्रेमिका के गेसुओं की तरह दिन भर छाव दे रहा है।
छात्रावास के छत के ऊपर नए चमकते दमकते सोलर पैनल लगा है लेकिन सभी सोच रहे हैं कि इससे बिजली कब मिलेगी....
उत्साह,जिम्मेदारी,विदाई तीनों के साथ छात्रावास खड़ा है..मन्द मन्द मुस्कुरा रहा है..अशोका के छोटे-छोटे पेड़ों के पत्ते हवा में फरफरा रहें हैं...आवाज कान तक पहुंच कर सोए छात्रों को उनके सपने का आभास दिलाते रहती है।
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बुक शेल्फ
चूड़ी बाजार में लड़की कृष्ण कुमार द्वारा लिखित स्त्री विमर्श पर एक बेहतरीन पुस्तक है। इस पुस्तक को तृतीय वर्ष के नीतीश कुमार ने पढ़ा है। इस पुस्तक की कुछ अच्छी पंक्तियों को आप लोगों के साथ साझा किया जा रहा है। इस पुस्तक में लेखक स्त्रियों की समाज में पिछड़ेपन के सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक कारणों की गहन विवेचना करते हैं।
1. स्त्री की आदर्श छवि एक मनुष्य के उन्हीं वैचारिक और नैतिक आग्रहों के तहत बनती है जो लिंगभेद से ऊपर हैं. लड़के का ऐसी लड़की की संकल्पना करता है जो उसे मनुष्य के रूप में प्रेरित करती हो और फिर भी उससे भिन्न हो. लिंग की भिन्नता स्त्री पुरुष के अदम्य आकर्षण का आधार है और इसी पर उनकी पारस्परिकता का विचार टिका है.
2. किशोरमन का एक महत्वपूर्ण पहलू बड़ो की जगह समवयस्कों की राय को सर्वोपरि मानना होता है.
3. लौकिक जगत में एक सामान्य पुरुष के लिए बेहतर विकल्प स्त्री कक पहले से काबू में रखना ठहरता है जिसके तहत उसकी स्वतंत्र शक्ति और शारीरिक व बौद्धिक क्षमताओं का सिलसिलेवार उच्छेदन किया जाता है.
4. सामाजिक सोच और निगाह के बने-बनाये ढाँचे हमें लड़कियों के बाल्यकाल को स्त्री के स्वीकृत जीवन-चक्र में रखकर ही देखने देते हैं,अलग से नहीं.
5. भाग्य और देह खेल में सबसे कठिन बाज़ी खाल के रंग की है. मिथकों पर गौर करें या लोककथाओं पर या फिर आधुनिक साहित्य और पत्रकारिता,सिनेमा और टेलीविजन पर,लड़की के रंग को लेकर हमारी सभ्यता और संस्कृति में डरावनी सहमति दिखाई देती है.
6. भारतीय जीवन में स्त्री की नियति सिर्फ एक वैधानिक मसला नहीं है बल्कि ये एक सांस्कृतिक मसला है.
7. एक लड़की को कपड़े उतार लिए जाने का भय सदा बना रहना चाहिए,यह द्रोपदी के चीर-हरण के मिथक का सहज और कठोर संदेश है.कैसी भी ताकत अथवा संबंध या हैसियत इस भय को दूर रखने के लिए पर्याप्त नहीं है.
8. लड़कों के जमावड़े में लड़कियों से अलगाव को भाषा और व्यवहारिक रूपाकार देने आनी संस्कृति जन्म लेती है और बहुत तेज़ी से ऐसी आदतें या लते पैदा कर देती है जो लड़कियों पर सामूहिक विजय की डींग हांकने, विजय के शाब्दिक दृश्य रचने और उन दृश्यों को सूत्र रूप में व्यक्त करने वाली गालियाँ देने में सुख-संतोष महसूस कराती हैं.
9. लड़कियां हमारी सिर्फ एक या दो अपेक्षाएं को पूरा करके संतोष नहीं दे सकती. उनसे हमारी अपेक्षाएं एक के बाद एक खुलती जाती हैं.
10. अनुभव कभी स्वंय ज्ञान नहीं बन सकता है,क्योंकि ज्ञान का अर्थ है अनुभव की तल्खी से मुक्ति. दूसरी तरफ, गहरे जाकर हिला देने वाले अनुभव को यदि विचार के क्षणों से गुजरने का मौका मिलता है तो इसके बाद हमारे मानस में जन्म लेने वाला ज्ञान कुछ अलग ही आभा और स्फूर्ति लिये होता है. इस तरह उपजने वाले ज्ञान से उस ज्ञान की तुलना नहीं की जा सकती जो सिर्फ पढ़ने या दूसरों को हुए अनुभवों का विश्लेषण करने से मिलता है. वह भी ज्ञान होता है और वह मूल्यवान हो सकता है, मगर अपने अनुभव के ताप को विचार की हवा में ठंडा करके पक्का ज्ञान सोने सरीखा होता है.
11. युवा होने का अभिप्राय किसी समस्या को देखकर तत्काल उसे दूर करने का उपाय खोजने के लिए व्यग्र होना और किसी-न-किसी उपाय पर अमल शुरू कर देना है.
12. संवेदना बहुत समय तक जागृत नहीं रहती, अतएव यदि कोई कदम तुरंत न उठाया जाए तो जीवन की सामान्य गति संवेदना को घेरकर सुला देती है.
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टीम आयाम
मुख्य संपादक : नीतीश कुमार (तृतीय वर्ष)
सह संपादक : विमलेंदु चौहान (द्वितीय वर्ष)
सह संपादक : कृष्ण नंदन (द्वितीय वर्ष)
टीम आयाम से जुड़ने के लिए अगस्त महीने के ब्लॉग पेज का आलोचनात्मक समीक्षा करके aayam.and.fss@gmail.com पर 30/08/2019 तक भेजें। संपादकीय टीम में केवल आचार्य नरेन्द देव छात्रावास के वर्तमान अंतःवासी ही सहभागिता कर सकते हैं।
आपके सुझाव व प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।
©सर्वाधिकार सुरक्षित आयाम
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बहुत ही अच्छा प्रयास लेकिन अँग्रेज़ी के कुछ लेख न होने से दुखी हूँ। समय की मांग है कि दोनों भाषाओं को बराबर प्रयोग में लाया जाए तभी लेखनी वृहद होगी। अगले अंक में इसका ध्यान रखा जाएगा ऐसी आशा रखता हूँ।
ReplyDeleteAll the very best
'आयाम' नाम से आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास से भित्ति पत्रिका 1992 में निकलती थी। भारत कला भवन के साहित्य खंड में रखने के लिए इसकी पाँडुलिपि ले जायी गयी थी।
ReplyDeleteआयाम को पुन: प्रारंभ करने के लिए साधुवाद।
बेहतरीन प्रयास. आप सब मिलकर सृजनशीलता प्रदर्शन कर रहे हैं। साधुवाद. मैं आपकी तरह वहां 1990 से 93 तक रहा. मेरा ब्लॉग अवलोकन करें www.daanapaani.net
ReplyDeleteसुखद अनुभूति | बहुत अपेक्षा हैं |
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